Monday, April 22, 2019

वामपंथी आतंकवाद और आईसिस के इस्लामी जिहाद में कोई अंतर नहीं, बिलकुल नहीं


वामपंथ ने 'सर्वहारा' का नाम लेकर पिछले 20 सालों में 12000 हत्याएँ कीं, जिसमें 2700 सुरक्षा बलों का बलिदान शामिल है। और मरने वाले कौन थे? प्राइवेट जेट से घूमने वाले जॉन ट्रवोल्टा टाइप के लोग, या प्राइवेट आइलैंड में छुट्टियाँ बिताने वाले जॉनी डेप्प की हैसियत वाले?
सबसे पहले मैं यह साफ कर देना चाहता हूँ कि मुझे न तो इससे मतलब है कि पहले के तथाकथित क्रांतिकारी लेनिन, माओ या विचारक मार्क्स ने क्या लिखा था, उनके विचार क्या थे, न ही इससे कि किसी आतंकी के हाथों की आसमानी किताब किसी मज़हब के बारे में क्या कहती है। मतलब इसलिए नहीं है कि विचारों का, या किताबी बातों का, सच्चाई और जमीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इसलिए, मैं किसी के विचारों के नाम पर, किसी किताब की कुछ आयतों के नाम पर जो हो रहा है, उसमें ज्यादा रुचि रखता हूँ, बजाय इसके कि कहीं दूसरी जगह यह कहा गया है कि हम तो शांतिप्रिय लोग हैं, या हम सर्वहारा की क्रांति कर रहे हैं।
मैं उन प्रतीकों का, उन बातों के वीभत्स रूप को हर रोज झेल रहा हूँ, इसलिए मैं अपने अनुभव, अपने समाज के अनुभव और अपने आस-पास देख कर बातें करूँगा न कि लेनिन ने जो हत्याएँ कराईं, माओ ने जो सामूहिक नरसंहार कराए, उसके पीछे की वजह क्या थी। मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि फ़लाँ किताब के फ़लाँ चैप्टर में यह लिखा है कि एक मानव की हत्या पूरे मानवता की हत्या है, क्योंकि ये कहने की बातें हैं, इनका वास्तविकता से कोई नाता नहीं है।
वामपंथ क्या है? एक ख़ूनी विचारधारा जिसका नाम लेकर भारत में पिछले 20 सालों में 12000 हत्याएँ कर दी गईं जिसमें 2700 सुरक्षा बलों का बलिदान शामिल है। ये हत्या किसके नाम पर हुई? ‘पीपुल्स’ यानी आम जनता के नाम पर, सर्वहारा के नाम पर। मरने वाले कौन थे? प्राइवेट जेट से घूमने वाले जॉन ट्रवोल्टा टाइप के लोग, या प्राइवेट आइलैंड में छुट्टियाँ बिताने वाले जॉनी डेप्प की हैसियत वाले?
जी नहीं, भारत में नब्बे प्रतिशत लोग या गरीब हैं, या बहुत ज़्यादा गरीब हैं। मरने वाले आँकड़े सरकारी हैं, और जो मरे हैं, वो अधिकतर वैसे लोग हैं जो भारत के सीमित संसाधनों के बीच किसी तरह जीवनयापन कर रहे थे। वो भी वही आम इन्सान थे जिनका नाम इनके पीपुल्स वार ग्रुप से लेकर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी या कम्यून की बातों में होता है।
हत्या तो महज़ एक संख्या है जो बड़ी या छोटी हो सकती है, जिसे हम या आप आँक सकते हैं, लेकिन उन 68 जिलों का क्या जहाँ माओवादी या नक्सली आतंक के साए में लोग जीने को मजबूर हैं? क्या उस डर को आँका जा सकता है? क्या उन बच्चियों पर किए गए बलात्कार, उन परिवारों पर की गई हर रोज की हिंसा को संख्या में आँका जा सकता है? शायद नहीं।
‘सर्वहारा’ शब्द इन वामपंथी आतंकवादियों के लिए एक ढाल है। ‘जन आंदोलन’ इनके निजी स्वार्थ के लिए पावर तक पहुँचने का एक ज़रिया मात्र है। आप खूब ढोल और डुगडुगी बजा लीजिए और क्रांति के गीत गाइए, लेकिन हर वामपंथी नेता के पीछे हिंसा और व्यभिचार की मेनस्ट्रीमिंग आपको दिख जाएगी। ‘तुम्हारी देह कम्यून की संपत्ति है’ जैसे जुमले सुना कर महिला काडरों का सेक्सुअल मोलेस्टेशन और रेप, इन कामपंथियों का ट्रेडमार्क है।
इनके नेताओं को कभी सुनिए कि कैसे इन्होंने शब्दों का सहारा लेकर सपने दिखाए हैं और जहाँ भी इन्होंने राज किया है, वहाँ पोलिटिकल किलिंग्स की बाढ़ ला दी है। मुझे याद आता है इसी विचारधारा के एक नेता का बयान जो सीपीएम जेनरल सेक्रेटरी विजयन थे, जिसने अपने पार्टी के लोगों को बंगाली कम्यूनिस्टों का तरीक़ा अपनाने को कहा था कि विरोधियों को ज़िंदा गाड़ दो नमक की बोरियों के साथ कि उनकी हड्डियाँ भी पुलिस को न मिले। इस एक वाक्य से भारत के दो कम्युनिस्ट शासित राज्य की सच्चाई बाहर आ जाती है। इन दोनों के राज्य में कितनी राजनैतिक हत्याएँ हुई हैं, वो गूगल कर लीजिए।
अब इस बात पर चर्चा कि मैंने इन्हें आईसिस के जिहादियों से क्यों जोड़ा। बहुत आसान है इन्हें ऐसा मानना। दोनों ही विचारधाराएँ आतंकी हैं, हिंसक हैं, और लोगों की जान लेना इन दोनों में जस्टिफाइड है। इस्लामी आतंकी कहते हैं कि मज़हब के नाम पर सारी मार-काट सही है, माओवंशी कामपंथी और लेनिन की नाजायज़ औलादें कहती हैं कि क्रांति की राह में जो भी आएगा निपटा दिया जाएगा।
दोनों के लिए फ़ंडिंग भी बाहर से ही आता है। अपहरण करके पैसा जुटाना दोनों का मुख्य काम रहा है। धमकी और वसूली से पैसा माँगना भारत में हर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में एक मुख्य तरीक़ा रहा है। दोनों ही तरीक़ों में बाहरी देशों का खूब इन्वॉल्वमेंट है। दोनों ही तरीक़ों में पोलिटिकल हैंडलिंग और संरक्षण, अपने हितों को देखते हुए राष्ट्र या राज्य की सत्ता देती रही है।
एक तरफ लक्ष्य सबको एक ख़लीफ़ा के नीचे लाना है, दूसरी तरफ कम्यून है। एक तरफ इस्लाम मज़हब और मुसलमान होना, अपने समाज और देश से बड़ी चीज है, दूसरी तरफ कम्यून के लिए समर्पण इतना प्रबल कि भारत और चीन लड़े तो भारतीय कम्युनिस्ट चीन के साथ खड़े दिखते हैं। विचारधारा सर्वोपरि हो जाती है, और उसके रास्ते में काफ़िर आए तो मारा जाता है, काटा जाता है, गोलियों से छलनी कर दिया जाता है, शांतिदूत बन कर बाज़ारों में फट जाता है या फिर सड़कों पर ट्रक चला कर लोगों को रौंद देता है।
दूसरी तरफ, कम्यून इतना सर्वोपरि हो जाता है कि सीआरपीएफ़ के जवानों को, स्कूली मास्टरों को, उन सरकारी लोगों को जिनके घर में वो अकेले कमाने वाले हों, बहुत गरीब तबके से आते हों, घेर कर मारने में ये एक बार सोचते भी नहीं। खुद घिर जाने पर बच्चों को ढाल बना कर बचते हैं, और अपने कम्यूनिस्ट कामरेड (कॉमरेड नहीं, कामरेड) की लाश में भी बम सिल देते हैं कि उसकी लाश में भी धमाका करके दो-चार और गरीब घरों के जवानों की बलि वामपंथ के नाम पर चढ़ जाए।
दोनों ही विचारधाराएँ, ख़ौफ़ और आतंक के आहार पर ज़िंदा हैं, और ये जिन लोगों की बेहतरी के सपने बेचते हैं, वो मुसलमान इन इलाकों में सबसे बदतर जीवन जीता है, और वो गाँव वाले बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। बात यह है कि अगर गाँव वाले तक सड़क, स्कूल, हॉस्पिटल पहुँच गए तो फिर इन वामपंथी आतंकवादी नरपिशाचों के जीवन का परपस, यानी लक्ष्य ही खत्म हो जाएगा। क्योंकि जेनएनयू जैसे संस्थानों में चलने वाली दारू की महफ़िलों में, गाँजे के ज्वाइंट फूँकते कामरेड ज्ञान तो बहुत बाँट देते हैं, शब्द तो बहुत जुटा लेते हैं, लेकिन इनकी निजी जिंदगी और इनके आदर्शों की बात में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है।
दोनों ही विचारधाराएँ आम जनता, गरीब, निर्दोष, निर्बल लोगों की लाशों के ख़ून से लाल और काले हो चुके झंडों के नीचे चलती हैं। दोनों के प्रवर्तकों ने भले ही मजहब और विचारों में ‘नशे’ आदि को नकारने की बात कही हो, लेकिन नशा और नशे में धुत्त आतंकी, इसी अफ़ीम को लोगों तक पहुँचा कर रिक्रूट करते हैं। नशा सिर्फ नशीली वस्तुओं का नहीं होता, नशा तो बातों का भी हो सकता है कि देखो वो दिन जब पूरा विश्व इस्लाम के झंडे तले होगा, देखो वो दिन जब पूरी दुनिया सर्वहारा के पैरों तले होगी।
किस जगह, किस नेता ने सर्वहारा को दुनिया दे दी? आईसिस के इस्लामी मूल्यों के तथाकथित रक्षक रात में महिलाओं का बलात्कार करते हैं, और दिन में कहते हैं बुर्क़ा पहन कर चलो, वरना दूसरे मर्द तुम्हें देख लेंगे। वैसे ही, लम्पट कामपंथी हास्यास्पद तरीके से लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करता है, और अपने विरोधियों को ज़िंदा दफ़नाने, बीच सड़क काट देने, और स्टेट मशीनरी का दुरुपयोग करके सैकड़ों लोगों को गायब करने से हिचकिचाता नहीं। इनकी नई पौध, लिंगलहरी कन्हैया बेगूसराय के कोरैय गाँव में विरोध का काला झंडा देखने पर अपने गुंडे छोड़ देता है और जो घर में घुस कर लोगों को पीटते हैं, सर फोड़ देते हैं।
इसलिए, जो ज़मीन पर है उसकी बात करते हैं। जो हो रहा है, उसकी ही बात होनी चाहिए। मार्क्स ने किस समाज की बात की थी, और उसके विचारों से प्रभावित तमाम राष्ट्र और नेता कैसे तानाशाह बन गए, उसे भी याद रखना ज़रूरी है। इस्लाम अगर शांति का मज़हब है, तो फिर उसके नाम पर जो हर दूसरे दिन लोगों को मारा जाता है, उस पर इस्लाम चुप कैसे है?
फिर मैं, किताब में क्या लिखा है, और कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो में कौन सी बात कही गई है, उससे क्या मतलब रखूँ? लिखा तो हमारी भी किताबों में बहुत कुछ था जिसमें इसी इस्लामी आतंक की आग लगा दी गई थी। कहने को तो जेएनयू में भी शिक्षा दी जाती है, और स्वतंत्रता है लेकिन वहाँ ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा तो लगता है।
फिर कम्यूनिस्टों के सत्ता से विरोधियों को किसी भी क़ीमत पर हटाने और आईसिस के ख़िलाफ़त के लक्ष्य में कौन-सा अंतर है? दोनों ही रक्तरंजित विचारधाराएँ हैं। उसके लिए इनके मैनिफेस्टो और मार्क्स की दाढ़ी कितनी अच्छी थी पर मैं क्यों स्खलित होता रहूँ, मेरे लिए तो इनके झंडे का लाल रंग उन करोड़ों लोगों की सामूहिक हत्या का रंग है जो इस आतंकी नक्सल माओवादी लेनिनवादी कामपंथी विचार की बलि चढ़ गए।
इसलिए, जब मैं लिखता हूँ कि अब ऐसी क्रांतियों की प्रासंगिकता नहीं है, तब मैं यह कहना चाहता हूँ कि अब दुनिया से ज़ारशाही और राजाओं का चलन जा चुका है। अब सर्वहारा ही वोट कर के अपने नेता को चुनती है। अब सर्वहारा के ही सर पर कोई पार्टी छत ला रही है, कोई सिलिंडर दे रहा है, कोई बिजली पहुँचा रहा है, कोई सड़क, हॉस्पिटल, स्कूल।
आयुष्मान योजना क्या सर्वहारा के लिए नहीं? गरीब किसानों के लिए तमाम योजनाएँ क्या सर्वाहारा के लिए नहीं? गाँवों की सड़कें क्या सर्वहारा के लिए नहीं? घरों में लटकते बल्ब क्या सर्वहारा के लिए नहीं? शौचालय की व्यवस्था और साफ होती गंगा क्या सर्वहारा के हिस्से नहीं आती? करोड़ों छतें क्या सर्वहारा के परिवार के लिए नहीं?
फिर ये कम्युनिस्ट लम्पट, कामांध कामरेड, लेनिन और माओ जैसे आतंकियों को अपना आदर्श मान कर किसका भला करने का लक्ष्य लिए चल रहे हैं? सर्वहारा की बात तो हर पार्टी कर रही है। कॉन्ग्रेस भी ‘गरीबी हटाओ’ ही कह रही है, भाजपा भी हर भारतीय पर 1,08,000 रूपए हर साल सब्सिडी या योजनाओं के नाम पर ख़र्च कर रही है। केजरीवाल, मायावती, अखिलेश, लालू, नायडू, ममता, कुमारस्वामी, योगी, मोदी सब तो ग़रीबों की ही बात कर रहे हैं।
फिर किस सर्वहारा को सत्ता दिलाने की योजना बना रहे हैं वामपंथी? मतलब साफ है कि ये सब चोर हैं, जिनका उद्देश्य कुछ और ही है। सर्वहारा को सत्ता किस वामपंथी या समाजवादी व्यक्ति ने दे दी, ये इतिहास जानता है। लालू जैसा सर्वहारा जब सत्ता में पहुँचा तो न सिर्फ अपने समय का सबसे बड़ा घोटाला किया बल्कि जानबूझकर शिक्षा से पूरी आबादी को वंचित रखा। कानून व्यवस्था की बर्बादी को चरम तक ले गया। बंगाल और केरल की बात पहले कर चुका हूँ।
इसलिए, ये जंगलों में छुप कर, अपने स्वार्थ के लिए, देश को तोड़ने, सरकारों को डीएस्टेबिलाइज करने, और दूसरी तरह के आतंकियों के लिए एक सपोर्ट सिस्टम बन कर खड़े हो रहे हैं। इनका उद्देश्य अब चिरकुटों वाला हो गया है जिसमें ये किसी गाँव वाले को वोट करने से रोक देते हैं तो खुश हो जाते हैं। आने वाले पाँच सालों में इनको कॉम्बिंग कर के जंगलों से घसीट कर निकाला जाएगा, और इस विचारधारा के ताबूत में अंतिम कीलें बहुत जल्द ठोकी जाएँगी। ज़रूरत थी एक सही तरह के सरकार की, जो आतंकी को आतंकी कहे, वामपंथी चरमपंथी उग्रवादी कह कर, उसे डाउनप्ले न करे।
वो सरकार आई तो ये सिमट गए, वो सरकार फिर आएगी, तो ये लाल सलाम कहाँ जाएँगे, ये कहने की आवश्यकता नहीं है।

Monday, April 8, 2019

Putting Secularism Into Perspective


Like before the last election in 2014, this time too, there are voices by so-called intellectuals that “secularism is in danger” if BJP comes to power again. Though Bharatiyas are generally highly intelligent, when it comes to secularism, most intellectuals, media and politicians get the concept wrong.
Since secularism is a western ‘invention’, I would like to put it into perspective:
Contrary to the general perception in Bharat, secular is not the opposite of communal. Communal as such is not objectionable either. It means ‘pertaining to a community’. In Germany, elections to local bodies are called “communal elections” (Kommunalwahlen).
Secular means worldly and is opposite to ‘religious’. Now ‘religious’ in this context refers to Christianity, i.e. to a well-organized, dogmatic religion that claims that it is the sole keeper of the Truth, which God himself has revealed to his Church.
And what is this revealed truth? In short: the human being is born in sin, which dates back to Adam and Eve. But fortunately, some 2000 years ago, God had mercy on humanity and sent his only son Jesus Christ to earth to redeem us by dying for our sins on the cross, then rising from the dead and going back to his father up in heaven. However, to be able to get the benefit of Jesus’ sacrifice, one must be baptized and become a member of the Church, otherwise one will be singled out for eternal hell on Judgment Day.
Understandably, such claims did not appeal to those who used their brains, but for many centuries they had to keep quiet or risk their lives.  The reason was that for long the Church was intertwined with the state, and  harsh laws made sure that people did not question the ‘revealed truth’. Heresy was punished with torture and death. Even in faraway Goa, after Francis Xavier called the Inquisition to this colony, unspeakable brutality was committed against Bharatiyas. In many Muslim countries till today, leaving Islam is punishable by death.
Significantly, those centuries, when Church and State were intertwined, when the clergy prospered and the faithful sheep suffered are called the dark ages. And the time when the Church was forced to loosen its grip, is called the age of enlightenment, which started only some 350 years ago. Scientific progress, which was greatly fostered by Bharat’s knowledge reaching Europe, played a crucial role in curbing the influence of the Church.
Slowly, the idea that reason, and not blind belief in a ‘revealed truth’, should guide society, took root in Europe and this lead to the demand for separation between State and Church. Such separation is called secularism. It is a recent phenomenon in the west.
Today, most western democracies are ‘secular’, i.e. the Church cannot push her agenda through state power, though most western democracies still grant Christianity preferential treatment. For example in Germany, the Constitution guarantees that the Christian doctrine is taught in government schools, or that Church tax is collected by the state. Nevertheless, the present situation is a huge improvement over the dark ages.
In Bharat, however, the situation was different. Here, the dominant faith of the Bharatiya people never had a power centre that dictated unreasonable dogmas and needed to be propped up by the state. Their faith was based on insights of the Rishis and on reason, intuition and direct experience. It expressed itself in a multitude of ways. Their faith was about trust and reverence for the One Source of all life. It was about doing the right thing at the right time according to one’s conscience. It was about The Golden Rule: not to do to others what one does not want to be done to oneself. It was about having noble thoughts. It was about how to live life in an ideal way. It was about Satya and Dharma.
However, this open atmosphere changed when Islam and Christianity entered Bharat. Bharatiyas, who good naturedly considered the whole world as family, were despised, ridiculed and even killed in big numbers only because they were ‘Hindus’ (which is basically a geographical term). Bharatiyas did not realise that dogmatic religions were very different from their own, ancient Dharma. For the first time they were confronted with merciless killing in the name of God. Voltaire, who fought the stranglehold of the Church in Europe, had accurately observed, “Those who can make you believe absurdities, can make you commit atrocities”.
During Muslim rule Hindus had to lie low for fear of their lives, and during British rule they were ridiculed by missionaries, and cut off from their tradition with the help of ‘education’ policies. Naturally, this took a toll on their self-esteem. In fact, till today, this low self-esteem especially in many members of the English educated class is evident to outsiders, though it may not be so to the persons concerned.
Swami Vivekananda’s efforts to give Hindus back their spine did not impact this class of people. Nevertheless, it is a great achievement that Hindu Dharma survived for so many centuries, whereas the west succumbed completely to Christianity and over 50 countries to Islam in a short span of time.
Coming back to secularism. Though Hindu Dharma survived and never dictated terms to the state, ‘secular’ was added to the Constitution of Bharat in 1976. There might have been a reason, as since Independence, several non-secular decisions had been taken. For example, Muslim and Christian representatives had pushed for special civil laws and other benefits and got them.
However, after adding ‘secular’, the situation did not improve. In fact the government seemed almost eager to benefit specifically the dogmatic religions (which secularism is meant to counter) and occasionally had to be restrained in its eagerness by the courts.
This is inexplicable.  Why would ‘secular’ be added and then not acted upon? And the strangest thing: ‘secular’ got a new, specific ‘Indian’ meaning. It means today: fostering those two big religions which have no respect for Hindus and whose dogmas condemn all of them to eternal hell – a fact that most Hindus simply laugh off or don’t even know.
It is a sad irony. Can you imagine the Jews honouring the Germans with preferential treatment instead of seeking compensation for the millions of Jews killed? Yet Islam and Christianity that have gravely harmed Bharatiyas over centuries got preferential treatment by the Bharatiya state, and their own beneficial dharma that has no other home except the Bharatiya subcontinent, is egged out. And to top it, this is called ‘secular’!
Obviously Bharatiyas have not learnt from the European experience. Hindus have not yet realized the intention of the dogmatic religions, though they say it openly: “We alone have the full truth. All must accept this.”
Media and politicians did their best to muddy the water. They called parties that represent a religious group, ‘secular’, instead of ‘religious’. When the state gave in to demands made by Christianity and Islam, it was (falsely of course) called ‘secular’.
Why did the government do this? Did it want to give its citizens a firsthand experience of what the dark ages were like? In the interest of all Bharatiyas it surely is wise for the state to ignore the powerful, dogmatic religions and focus on all citizens equally. This means being ‘secular’ in the western sense.
Yet this advice is valid only regarding dogmatic religions which demand blind belief in unverifiable and even divisive dogmas. It does not apply to Dharma.
It would be a disaster if the state would also ignore Dharma and become adharmic. Every citizen needs to do what is right under the given circumstances, including politicians. This shows that Hindu Dharma, as Bharat’s tradition is called, is in a completely different category from religion. There must never be a separation between State and Dharma.
On the contrary, only when all politicians follow dharma, when they follow their innate knowledge about what is the right thing to do, Bharat has the best chance to truly shine again and become the famed golden bird.
(This article first appeared on author’s blog on 5th April, 2019 and has been reproduced here in full.) , She is our Elder Sister Ms maria Wirth,

Monday, March 25, 2019

Forgotten Heroes – Veer Durgadas Rathore


What I narrate here is folklore as heard in various ballads sung even today in the interiors of Rajasthan
माई ऐड़ा पूत जन, जेड़ा दुर्गादास,
बाँध मुंडासे राखियो, बिन थांबे आकाश
Mother, give birth to a son just like Durgadas, who stopped the flooding dam of Moghuls single-handedly
Veer Durgadas was one of the chieftains of Maharaja Jaswant Singh, the ruler of Jodhpur when Aurangzeb ruled over Delhi. When the young Jaswant Singh contracted a terminal illness, he became anxious for the fate of his infant son. He was not oblivious to the danger, on his death, to his child’s life from some of his more ambitious chieftains.
Sensing that the dying king was worried, Veer Durgadas approached him and sought to know the reason for his anxiety. Jaswant Singh disclosed his fears to Durgadas, and said he was fending off death on account of his anxiety for the child’s future! To assuage the King’s fears, Durgadas assembled a few other trusted chiefs loyal to the King and made them swear on Maa Jagadambaa, that as long as even one of them was alive, they would protect the king’s family. Entrusting the custody of his toddler to Durgadas, Jaswant Singh bid adieu to the mortal world.
Those were treacherous times; there were people who wanted to join hands with the Moghuls and take over the reins of Marwar (Jodhpur). No one could be trusted!
Aurangzeb himself wanted to annex Jodhpur under the pretext that Ajeet Singh was an infant. To counter this, Durgadas created espionage and counter-espionage networks to keep himself informed of every move of both the locals and Mughals. His shrewdness, intelligence and foresight ensured that he was always ahead of the enemies of Marwar.
However, Aurangzeb, with the support of some disloyal Rajput chiefs, annexed Jodhpur and took the child Ajeet Singh into custody. Durgadas, with the Thakur of Balunda (a small riyasat in Marwar), made plans to rescue the young Ajeet Singh from the clutches of the Mughals. Jadaawji, a Chaaran (poet warrior), disguised himself as a snake charmer and gained entry to the room where Ajeet Singh was held prisoner. He hid little Ajeet in a basket and took him out of the palace. Discovering his disappearance, the Mughal soldiers gave hot pursuit. Ten to fifteen valorous Rajputs would lag behind to engage the Moghuls, providing time for Durgadas and Ajeet Singh to gain some distance. All the warriors would be slain and then the pursuit would resume! In the end, Durgadas, Thakur Mokham Singh of Balunda, Jadaawji, and 7 horsemen were all that managed to reach the safety of Marwar.
Ajeet Singh remained in Balunda till his teenage years. During this time, Durgadas showed great strategic acumen and engaged the Moghuls in relentless guerilla warfare thereby inflicting heavy damages.
With Aurangzeb growing old, wars of succession broke out amongst his children. Durgadas supported one of the sons, Akbar, in the succession war. Soon, Akbar died of an illness and Aurangzeb made a request to Durgadas that his daughter in law and grandchildren be returned to him. Durgadas, the man of honour, permitted the lady and her children to return to Aurangzeb!
On their return, Aurangzeb is supposed to have asked his daughter in law –
कैसा दिखता है वो चूहा?
         How does that mouse look?
The daughter in law replied –
कैसा दिखता है? जहाँपनाह, जोधपुर में उन्हें बाबोसा कहा जाता है और किसी की हिम्मत कहाँ कि उनसे नज़र मिला के उनकी तरफ देख सके! हमने तो सिर्फ उनकी रौबदार आवाज़, या जूतियों की आहट ही सुनी है!
How does he look? O Emperor, in Jodhpur everyone respectfully calls him (Durgadas) Babo-sa and no one dares to meet his gaze. I have only heard his powerful voice or the light sound of his footsteps.
It was inconceivable for a barbarian like Aurangzeb that his daughter-in-law would have escaped untouched, but Veer Durgadas was a man of such honour that he never even looked at the Moghul princess! He was a true worshipper of Shakti – one who respects and protects the honour of women, even if they belonged to the enemy camp! Such decency, in times when the norm was to have the women of the opposite camp for yourself! Alas! My head hangs in shame whenever I read news of the rape nowadays, and sociologists say those were the dark ages!
आठ पहर चौबीस घडी, घुडले ऊपर वास
सैल अणि सूं सेकतो, बाटी दुर्गादास
Riding horseback, days and nights would pass! On the rough terrain of Aravalis, Durgadas baked flour balls with the tip of his spear!
Durgadas Rathore Painting in Jodhpur Museum (Wikipedia)
For a good 20-25 years, Durgadas kept fighting the Moghuls from the hills of Sirohi and Pali. In 1707, Aurangzeb died. Seizing this opportunity, Durgadas quelled the disarrayed Mughal Army and took control of Jodhpur. He performed the Rajyabhishek (coronation) of Ajeet Singh, and fulfilled the promise he had made to his father Jaswant Singh.
This exemplifies the greatness and the true character of Durgadas. There have been many warriors who fought for their own land and women, but only one Durgadas who fought for concepts as abstract as loyalty and Religion. He could have easily eliminated Ajeet Singh and become King himself, but he chose to remain loyal to his word and gave the kingdom unhesitatingly to Ajeet Singh! There are few parallels of such unflinching loyalty to one’s motherland and such absolute detachment from power!
Alas! If only we Hindus had learnt of and been inspired by this soul, the history of this subcontinent would have been different. Instead of defeat to those who managed to cross the Sindhu, we would have been a proud race, loving humanity, detached from worldly riches, but unyielding in our honour and self-respect!
The tragedy of Veer Durgadas begins now….
सिंघां देस विदेस सम, सिंघां किशा वतन्न
सिंह जिका वन संचरे, सो सिंघां रा बन्न
Homeland or foreign, is the same for lions! What nation can contain a lion? Whatever land he wanders into, that land belongs to the lion!
The final chapter of Durgadas’s life – tragic, but also one that raises Durgadas to sublime heights! Sometimes, I find it difficult to believe that we Hindus are progeny of such brave, dignified souls!
Having crowned Ajeet Singh as the King, Durgadas relegated himself to the background, spending his time and energy in rebuilding temples destroyed by the Moghuls. Then alas, unfortunate events occurred, as has been the misfortune of this great land. Ajeet Singh, probably as a consequence of his insecure childhood or below-average mind, became jealous and suspicious of Durgadas, the very man on account of whom he was alive!
There is a story that Ajeet Singh is supposed to have once said to Durgadas
बाबोसा, आप म्हारे हामी मति बैठिया करो
Old man, you must not sit in front of me in the Durbaar
When Durgadas gave him a questioning look, Ajeet said –
आपने देखूं तो मने विखा रा दिन याद आवे!
When I see you, I get reminded of the days of my deprivation!
So much for the wisdom and grace of some of our lesser rulers!
Durgadas endured such insults for the sake of his loyalty to his motherland, till one day Ajeet Singh’s cronies convinced him to do away with Durgadas. Durgadas got scent of his plans and the day he was to be murdered, he approached the King in the Durbaar and spoke aloud – “I came into possession of a lot of gold during the battles in South Bharat. I am old now and want to retire after gifting you the gold”.
Ajeet Singh indicated to his men to refrain from killing Durgadas. An appointment was fixed for Durgadas and Ajeet Singh to meet in the outskirts of Jodhpur. Durgadas had asked 500 horsemen loyal to him to lie in ambush, and as soon as Ajeet Singh turned up, he was surrounded. Durgadas said to him –
ऊंदरा, थूं मने मारेला? हूँ तुर्कों रे हाथ नी आयो, थूं मने मारेला? अगर थारा बाप ने वचन नी दियो वेतो तो अबार थारो माथो वाड देतो! थाने सोनो चावे? औ जोधपुर रो राज दियो नी थाने, अबे आगो जा!
You rat! You will kill me? I could not be contained by the Turks! You will kill me? Had I not promised your father to protect you, I would have beheaded you right now! And what more gold do you expect from me? I have given you the kingdom of Jodhpur! Now, get lost before I forget my promise to your father
Durgadas Rathore, well into his 70s, along with a few friends, turned away from his beloved motherland and rode away into the sunset. He walked away from the land where he was born, nurtured with his blood and sweat, for the sake of a promise. The lion of a man walked away after showing his prey his real worth, his head held high, in honour and unflinching loyalty!!  The eagle cast a final glance on the kingdom of Jodhpur, spread his wings, and took flight into oblivion. And the land of Marwar lost a worthy son to the treachery of lesser mortals!
From Jodhpur, Durgadas went to stay in Udaipur. One day, the Maharana of Udaipur, gifted watermelons to the camp of Durgadas. Immediately Durgadas asked his men to prepare to leave. When asked the reason, Durgadas replied – “The Maharana has asked us to leave.  Watermelon is called ‘matiro‘ in Mewari. It can be broken into ‘mati ‘ and ‘rho‘ meaning – don’t stay!”
Durgadas then went to Ujjain where he lived an ascetic’s life. On 22 November 1718, on the banks of the Kshipra, aged 81 years, Veer Durgadas breathed his last, with only a handful of his loyal friends by his side to witness his journey to the heavenly abode.
The samadhi (memorial) of Veer Durgadas had lain in tatters for almost 250 years, when, in the 1950s, my grandfather, the late Akshay Singh Ratnu went to Ujjain and wrote at least 300 letters to various Rajput  organisations, urging them to rebuild the samadhi. Sometime in the 1980s, the current Maharaja of Jodhpur, Gaj Singh, a fine and compassionate soul, went to Ujjain and got the Jeernoddhardone. Renamed the Chakrateertha, the samadhi of Durgadas was rebuilt in red sandstone.
I went to Ujjain in 2005. It took me 4 hours to find the monument as it wasn’t on the tourist map. Ultimately, meandering thru a shamshaan, I reached the most sacred place for a Kshatriya!
I stood spell bound, looking at the proud Chhatri for a real man, the passage of time had not diluted the impact of Veer Durgadas on my being. I asked my auto driver to arrange for a broom. As I cleaned the place of dust and cobwebs, I called up my father, late Karni Singh Ratnu. He asked me to describe how it looked and if it was well kept!
Both of us cried on the phone when I told him about the barrenness and the filth in which the grand old man’s memory lay! Papa asked me to sit there and meditate for a while. The auto driver, a Muslim, came up to me with a bottle of water and asked – “Sir, is this a Chhatri of one of your ancestors”? I looked back at him and replied – “Yes! A Chhatri for our ancestors, both yours and mine“. He then heard the whole story. He folded his hands in reverence and both of us cleaned the place. A so-called ‘small’ man had the wisdom to understand the value of timeless valour and loyalty, something which evades our so-called educated masses and intelligentsia!
We Hindus can never regain our lost pride and glory till we are obsessed with pseudo morals of ahimsaand peace, shorn of contextual application with dharma. Men of honour have to fight for truth to prevail in this wide, wicked world; the valorous are duty-bound to keep barbarians at bay from our motherland!
If one Durgadas could confront the supposedly mighty Moghul empire, imagine the fate of this country, if even one of the Riyasats of Rajasthan had joined hands with him! Alas, that was not to be! And sadly the same myopic attitude and infighting continue even today, one of the most dangerous times for our civilization!
History never looks back kindly at those who do not learn from it!
After sharing this story with my friends, I got a response from a doctor colleague who said she will read out this story to her son. I wrote back saying – “Yes, you must! No matter, what these leftist historians might shove down our throat, tell him that his ancestors were valorous and loyal. Tell him that the Mughals did not have a cakewalk over our motherland. Tell him that they will watch over him when he conducts himself with dignity and pride. Tell him that a word, a shabd, is (para)brahman itself, and is worth laying our life for. Tell him that the values one lives for, make a man out of him. Riches, fame and respect follow such men wherever they go, as the shadow follows one’s body, in this life and after”
If we can stand up and clap for Western heroes, then let our children look up to our past too with pride and draw inspiration from the likes of Veer Durgadas! That we resisted against wrong! That we chose to die rather than be taken slaves! That we stood up, not for selfish gains, but for the motherland. From that confidence alone shall Hindus rise and claim their rightful place in the league of nations!
Shubhamastu!
Omendra
-By Dr. Omendra Ratnu , sabhar from writer 

मैं आज एक गंभीर पत्र अपने देशवासी मुसलमानों को विशेष रूप से और विश्व भर के मुसलमानों को सामान्य रूप से लिख रहा हूँ.

मैं आज एक गंभीर पत्र अपने देशवासी मुसलमानों को विशेष रूप से और विश्व भर के मुसलमानों को सामान्य रूप से लिख रहा हूँ.

मैं आज एक गंभीर पत्र अपने देशवासी मुसलमानों को विशेष रूप से और विश्व भर के मुसलमानों को सामान्य रूप से लिख रहा हूँ. संभव है मैं जिन मुसलमान बंधुओं से बात करना चाहता हूँ उन तक मेरा ये पत्र सीधे न पहुंचे अतः आप सभी से निवेदन करता हूँ कि कृपया मेरे पत्र या इसके आशय को मुस्लिम मित्रों तक पहुंचाइये। संसार आज एक भयानक मोड़ पर आ कर खड़ा हो गया है। भारत, पाकिस्तान, बांग्ला देश, इंडोनेशिया, कंपूचिया, थाई लैंड, मलेशिया, चीन, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, ईराक़, सीरिया, लीबिया, नाइजीरिया, अल्जीरिया, मिस्र, तुर्की, स्पेन, रूस, इटली, फ़्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी, डेनमार्क, हॉलैंड, यहाँ तक कि इस्लामी देशों से भौगोलिक रूप से कटे संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भी आतंकवादी घटनाएँ हो रही हैं. विश्व इन अकारण आक्रमणों से बेचैन है। कहीं स्कूली छात्र-छात्राओं पर हमले, तो कहीं बाजार में आत्मघाती हमलावरों के बमविस्फोट, तो कहीं घात लगा कर लोगों की हत्याएं...संसार भर में ये भेड़िया-धसान मचा हुआ है। सभ्य संसार हतप्रभ है। हतप्रभ शब्द जान-बूझ कर प्रयोग कर रहा हूँ चूँकि पीड़ित समाज को इन आक्रमणों का पहली दृष्टि में कोई कारण नहीं दिखाई दे रहा मगर एक बात तय है कि सभ्य समाज इन हमलों के कारण क्रोध से खौलता जा रहा है. उसकी भृकुटियां तनती जा रही हैं।

मेरे देखे वो इसका कारण इस्लाम को मानने पर विवश हो रहा है। इन लोगों में हिन्दू, यहूदी, ईसाई, बौद्ध, शिन्तो मतानुयाई, कन्फ्यूशियस मतानुयाई, अनीश्वरवादी सभी तरह के लोग हैं। संसार भर में मुसलमानों के विरोध में एक अंतर्धारा बहने लगी है , आप यू ट्यूब, फ़ेसबुक, इंटरनेट के किसी भी माध्यम पर देखिये, पत्र-पत्रिकाओं में लेख पढ़िए, अमुस्लिम समाज में इस्लाम को ले कर एक बेचैनी हर जगह अनुभव की जा रही है। हो सकता है आप इसे न देख पा रहे हों या इसकी अवहेलना कर रहे हों मगर ये आज नहीं तो कल आपकी आँखों में आँखें डाल कर कड़े शब्दों में बात या जो भी उसके जी में आयेगा करेगी। यहाँ ये बात भी ध्यान देने की है कि इन सभी माध्यमों पर इक्का-दुक्का मुस्लिम समाज के लोग इस बेचैनी को सम्बोधित करने का प्रयास कर रहे हैं मगर लोग उनके तर्कों, बातों से सहमत होते नहीं दिखाई दे रहे।

मैं भारत और प्रकारांतर में विश्व का एक सभ्य नागरिक होने के कारण चाहता हूँ कि संसार में उत्पात न हो, वैमनस्य-घृणा समाप्त हो. इसके लिए मेरे मन में कुछ प्रश्न हैं. इस सार्वजनिक और खुले मंच का प्रयोग करते हुए मैं आपसे इन प्रश्नों का उत्तर और समाधान चाहता हूँ. विश्व शांति के लिए इस कोलाहल का शांत होना आवश्यक है और मुझे लगता है कि आप भी मेरी इस बात से सहमत होंगे।

जिन संगठनों ने विभिन्न देशों में आतंकवादी कार्यवाहियां की हैं उनमें से कुछ सबसे नृशंस हत्यारे समूहों के नाम प्रस्तुत हैं. मुस्लिम ब्रदरहुड, सलफ़ी, ज़िम्मा इस्लामिया, बोको हराम, जमात-उद-दावा, तालिबान, ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामी मूवमेंट, इख़वानुल मुस्लिमीन, लश्करे-तैय्यबा, जागृत मुस्लिम जनमत-बांग्ला देश, इस्लामी स्टेट, जमातुल-मुजाहिदीन, अल मुहाजिरो, दौला इस्लामिया...इत्यादि. इन हत्यारी जमातों में एक बात सामान्य है कि इनके नाम अरबी हैं या इनके नामों की शब्दावली की जड़ें इस्लामी हैं. ये संगठन ऐसे बहुत से देशों में काम करते हैं जहाँ अरबी नहीं बोली जाती तो फिर क्या कारण है कि इनके नाम अरबी के हैं ? ये प्रश्न बहुत गंभीर प्रश्न है कृपया इस पर विचार कीजिये. न केवल इस्लामी बंधु बल्कि सेक्युलर होने का दावा करने वाले सभी मनुष्यों को इस पर विचार करना चाहिए। इन सारे संगठनों के प्रमुख लोगों ने जो छद्म नाम रखे हैं वो सब इस्लामी इतिहास के हिंसक लड़ाके रहे हैं. उन सबके नाम हत्याकांडों के लिए कुख्यात रहे हैं. उन सब ने अपने विश्वास के अनुसार अमुस्लिम लोगों को मौत के घाट उतरा है, उनसे जज़िया वसूला है. कृपया मुझे बताएं कि ऐसा क्यों है ? क्या इस्लाम अन्य अमुस्लिम समाज के लिए शत्रुतापूर्ण है, यदि ऐसा नहीं है तो इन संगठनों के नामों का इस्लामी होना मात्र संयोग है ? कोई भी तर्कपूर्ण बुद्धि इस बात को स्वीकार नहीं कर पायेगी। कृपया इस पर प्रकाश डालें।

मैं एक ऐसे राष्ट्र का घटक हूँ स्वयं जिस पर ऐसे लाखों कुख्यात हत्यारों ने आक्रमण किये हैं। ये कोई एक दिन, एक माह, एक साल, एक दशक, एक सदी की बात नहीं है। मेरे घर में सात सौ बारह ईसवी में किये गए मुहम्मद बिन क़ासिम की मज़हबी गुंडागर्दी से ले कर आज तक लगातार उत्पात होते रहे हैं। मेरे समाज के करोड़ों लोगों का धर्मान्तरण होता रहा है। ये मेरे सामान्य जीवन-विश्वास के लिए कोई बड़ी घटना नहीं थी। मेरे ग्रंथों की अंतर्धारा "एकम सत्यम विप्रः बहुधा वदन्ति", "मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना" है. मैं मानता ही नहीं इस दर्शन को जीता भी हूँ। मेरे लिए ये कोई बात ही नहीं थी कि मेरी शरण में आने वाला यहूदी, पारसी, मुसलमान समाज अपने निजी विश्वासों को कैसे बरतता है। वो अपने रीति-रिवाजों का पालन कैसे करता है। उसने अपने चर्च, सिने गॉग, मस्जिदें कैसी और क्यों बनाई हैं. मेरे ही समाज के बंधु मार कर, सता कर, लालच दे कर अर्थात जैसे बना उस प्रकार से मुझसे अलग कर दिए गए। यदि आप इसे मेरी अतिशयोक्ति मानें तो कृपया इस तथ्य को देखें कि ऐसे हत्याकांडों के कारण ही हिन्दू समाज की लड़ाकू भुजा सिख पंथ बनाया गया। गुरु तेग़ बहादुर जी का बलिदान, गुरु गोविन्द सिंह जी के चारों साहबजादों की हत्याओं को किस दृष्टि से देखा जा सकता है ?

मगर एक अजीब बल्कि किसी भी राष्ट्र के लिए असह्य बात, ये देखने में आई कि राष्ट्र पर हमला करने वाले इन आक्रमणकारियों के प्रति मेरे ही इन मतांतरित हिस्सों ने कभी रोष नहीं दिखाया। इनकी कभी निंदा नहीं की, बल्कि इन्हीं मतांतरित बंधुओं ने इन हमलावरों के प्रति प्यार और आदर दिखाया। इन आक्रमणकारियों ने जिनके पूर्वजों की हत्याएं की थी, उनकी पूर्वज स्त्रियों के साथ भयानक अनाचार किये थे, उन्हें हर कथनीय-अकथनीय ढंग से सताया था, उनके लिए मेरे ही राष्ट्र बंधुओं में आस्था कैसे प्रकट हो गयी ? इन हमलावरों के नाम पर देश के मार्गों, भवनों के नाम का आग्रह इन मतांतरित बंधुओं ने क्यों किया ? मेरे ही हिस्से मज़हब का बदलाव करते ही अपने मूल राष्ट्र के शत्रु कैसे और क्यों बन गए ? क्या इसका कारण इस्लामी ग्रंथों में है ? क्या इस्लाम राष्ट्र-वाद का विरोधी है ?

मैं सारे देश भर में घूमता रहता हूं. मुझे सड़कों के किनारे तहमद-कुरता या कुरता-पजामा पहने , गठरियाँ सर पर उठाये लोगों के चलते हुए समूह ने कई बार आकर्षित किया है. ये लोग अपने पहनावे के कारण स्थानीय लोगों में अलग से पहचाने जाते हैं. मेरी जिज्ञासा ने मुझे ये पूछने पर बाध्य किया कि ये लोग कौन हैं ? कहाँ से आते हैं ? इनके दैनिक ख़र्चे कैसे पूरे होते हैं ? उत्तर ने मुझे हिला कर रख दिया. मालूम पड़ा कि ये लोग अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नदवा तुल उलूम-लखनऊ, देवबंद के मदरसे जैसे संस्थानों के अध्यापक और छात्र होते हैं. मेरी दृष्टि में अध्यापकों और छात्रों का काम पढ़ाना और पढ़ना होता है. पहले मैं ये समझ ही नहीं पाया कि ये लोग अपने विद्यालय छोड़ कर दर-दर टक्करें मारते क्यों फिर रहे हैं ? अधिक कुरेदने पर पता चला कि ये कार्य तो सदियों से होता आ रहा है और यही लोग मतांतरित व्यक्ति को अधिक कट्टर मुसलमान बनाने का कार्य करते हैं। यानी मेरे राष्ट्र के मतांतरित लोगों में जो अराष्ट्रीय परिवर्तन आया है उसके लिए ये लोग भी जिम्मेदार हैं. इन्हीं लोगों के कुकृत्यों पर नज़र न रखने का परिणाम देश में इस्लामी जनसँख्या का बढ़ते जाना और फिर उसका परिणाम देश का विभाजन हुआ. इन तथ्यों से भी पता चलता है कि इस्लाम राष्ट्रवाद का विरोधी है।

ये कुछ अलग सी बात नहीं साम्यवाद भी राष्ट्रवाद का विरोधी है मगर कभी भी एक देश के साम्यवादी उस देश के शासन और राष्ट्र के ख़िलाफ़ किसी दूसरे देश के कम्युनिस्ट शासन के बड़े पैमाने पर पक्षधर नहीं हुए हैं. मैं इस बात को सहज रूप से स्वीकार कर लेता मगर मेरी समझ में एक बात नहीं आती कि अरब की भूमि और उससे लगते हुए अफ्रीका में कई घोषित इस्लामी राष्ट्र हैं. इनमें अरबी या उससे निसृत कोई बोली बोली जाती है तो ये देश एक देश क्यों नहीं हो जाते ? इस्लामी बंधुता अथवा उम्मा की भावना क्या केवल अरब मूल के बाहर के लोगों के लिए ही है ? सऊदी अरब, क़तर, संयुक्त अरब अमीरात इत्यादि देश आर्थिक रूप से बहुत संपन्न देश हैं. ये देश भारत, पाकिस्तान, बांग्ला देश में मस्जिदें, मदरसे बनाने के लिए अकूत धन भेजते रहे हैं मगर क्या कारण है कि सूडान के भूख-प्यास से मरते हुए मुसलमानों के लिए ये कुछ नहीं करते ? क्या इस्लामी बंधुता अरब मूल से बाहर के लोगों को अरबी लोगों की मानसिक दासता स्वीकार करने का उपकरण है ? यहाँ एक चलता हुआ प्रश्न पूछने से स्वयं को नहीं रोक पा रहा हूं. मैंने मुरादाबाद के एक इस्लामी एकत्रीकरण जिसे आप इज्तमा कहते हैं, में ये शेर सुना था

मेरे मौला बुला ले मदीने मुझे
मारे गर्मी के आवें पसीने मुझे 

मेरी जानकारी में मदीना रेगिस्तान में स्थित है और वहां बर्फ़ नहीं पड़ती. भारत से कहीं अधिक गर्म स्थान में जाने की इच्छा मेरी बात '' इस्लामी बंधुता अरब मूल से बाहर के लोगों को अरबी लोगों की मानसिक दासता स्वीकार करने का उपकरण है '' की पुष्टि करती है. लाखों हिन्दू भारत से बाहर रहते हैं. उनमें गंगा स्नान, बद्रीनाथ, केदारनाथ, पुरी इत्यादि तीर्थों के दर्शन की इच्छा होती है मगर मैंने कभी नहीं सुना कि वो टेम्स, कलामथ, कोलोराडो या उन देशों की नदियों पर लानतें भेजते हुए गंगा में डुबकी लगाने के लिए भागे चले आने की बातें कहते हों.
मैं एक शायर हूँ और लगभग चौंतीस-पैंतीस साल से मुशायरों में जाता हूँ ईराक युद्ध के समय मैं बहुत से मुशायरों में शायर के नाते जाता था. वहां मुझे सद्दाम हुसैन के पक्ष में शेर सुनने को मिलते थे और श्रोता समूह उनके पक्ष में खड़ा हो कर तालियां पीटता था. एक शेर जो मूर्खता की चरम सीमा तक हास्यास्पद होने के कारण मुझे अभी तक याद है आपको भी सुनाता हूं

ये करिश्मा भी अजब मजहबे-इस्लाम का है
इस बरस जो भी हुआ पैदा वो सद्दाम का है

इस शेर पर हज़ारों लोगों की भीड़ को मैंने तालियां पीटते, जोश में आ कर नारा-ए-तकबीर बोलते सुना है. मैं ये कभी समझ नहीं पाया कि अपनी संतान का पिता सद्दाम हुसैन को मानना यानी अपनी पत्नी को व्यभिचारी मानना किसी को कैसे अच्छा लग सकता है ? मगर ये स्थिति कई मुशायरों में एक से बढ़ कर एक पाई तो समझ में आया कि वाकई ये करिश्मा इस्लाम का ही है। एक अरबी मूल के व्यक्ति के पक्ष में, जिसको कभी देखा नहीं, जिसकी भाषा नहीं आती, जिसके बारे में ये तक नहीं पता कि वो बाथ पार्टी का यानी कम्युनिस्ट था, केवल इस कारण कि वो एक अमुस्लिम देश अमरीका के नेतृत्व की सेना से लड़ रहा है, समर्थन की हिलोर पैदा हो जाने का और कोई कारण समझ नहीं आता। यहाँ ये बात देखने की है कि इस संघर्ष का प्रारम्भ सद्दाम हुसैन द्वारा एक मुस्लिम देश क़ुवैत पर हमला करने और उस पर क़ब्ज़ा करने से हुआ था. ईराक़ और क़ुवैत के लिए ये लड़ाई इस्लामी नहीं थी मगर भारत, पाकिस्तान, बंगला देश के मुसलमानों के लिए थी. इसे अरब मूल के पक्ष में अन्य मुस्लिम समाज की मानसिक दासता न मानें तो क्या मानें ? इसका कारण इस्लाम को न माने तो किसे मानें ?

इन तथ्यों की निष्पत्ति ये है कि इस्लाम अपने धर्मान्तरित लोगों से उनकी सबसे बड़ी थाती सोचने की स्वतंत्रता छीन लेता है। धर्मान्तरित मुसलमान अपने पूर्वजों, अपनी धरती के प्रति आस्था, अपने लोगों के प्रति प्यार, अपने इतिहास के प्रति लगाव से इस हद तक दूर चला जाता है कि वो अपने अतीत, अपने मूल समाज से घृणा करने लगता है ? उसमें ये परिवर्तन इस हद तक आ जाता है कि वो अरब के लोगों से भी स्वयं को अधिक कट्टर मुसलमान दिखने की प्रतिस्पर्धा में लग जाता है। सर सलमान रुशदी की किताब के विरोध में किसी अरब देश में हंगामा नहीं हुआ। फ़तवा ईरान के ख़ुमैनी ने बाद में दिया था मगर हंगामा भारत, बंगला देश, पाकिस्तान में पहले हुआ। ऐसा क्यों है कि एक किताब का, बिना उसे पढ़े इतना उद्दंड विरोध करने में अरब मूल से इतर के लोग आगे बढे रहे ? क्या इसकी जड़ें अपने उन पड़ौसियों, साथियों, को जो मुसलमान नहीं हैं, का इस्लाम के आतंक और उद्दंडता से परिचित करने में हैं ? अगर आप उसे ठीक नहीं मानते थे तो क्या इसका शांतिपूर्ण विरोध नहीं किया जाना चाहिए था ? सभ्य समाज में पुस्तक का विरोध दूसरी पुस्तक लिख कर सत्य से अवगत करना होता है मगर ऐसा क्यों है कि सभ्य समाज के तरीक़ों का प्रयोग मुस्लिम समाज नहीं करता ? जन-प्रचलित भाषा में पूछूं तो इसे ऐसा कहना उचित होगा कि मुसलमानों का एक्सिलिरेटर हमेशा बढ़ा क्यों रहता है ?

क्या इस्लाम तर्क, तथ्य, ज्ञान की सभ्य समाज में प्रचलित भाषा-शैली का प्रयोग नहीं करता या नहीं कर सकता ? ऐसा क्यों है कि इस्लामी विश्व, शालीन समाज के तौर-तरीक़ों से विलग है ? किसी भी इस्लामी राष्ट्र में संगीत, काव्य, कला, फिल्म इत्यादि ललित कलाओं के किसी भी भद्र स्वरूप का अभाव है. इस्लामी राष्ट्रों में संयोग से अगर ऐसा कुछ है भी तो उसके ख़िलाफ़ इस्लामी फ़तवे, उद्दंडता का प्रदर्शन होता रहता है ? विभिन्न दबावों के कारण अगर ये साधन नहीं होंगे तो समाज उल्लास-प्रिय होने की जगह उद्दंड हत्यारों का समूह नहीं बन जायेगा ? यहाँ ये पूछना उपयुक्त होगा कि बलात्कार जैसे घृणित अपराधों में सारे विश्व में मुसलमान सामान्य रूप से अधिक क्यों पाये जाते हैं ? उनके नेतृत्व करने वाले सामान्य ज्ञान से भी कोरे क्यों होते हैं ? क्या ये परिस्थितयां ऐसे हिंसक समूह उपजाने के लिए खाद-पानी का काम नहीं करतीं ?

ऐसा क्यों है कि इस्लाम सारे संसार को अपना शत्रु बनाने पर तुला है ? यहूदियों के ऐतिहासिक शत्रु ईसाइयों को ग़ाज़ा में इज़रायल के बढ़ते टैंक अपनी विजय क्यों प्रतीत होते हैं ? क्या इसका कारण आचार्य चाणक्य का सूत्र " शत्रु का शत्रु स्वाभाविक मित्र होता है " तो नहीं है ? ईसाइयों ने यहूदियों से शत्रुता हज़ारों साल निभायी, निकाली मगर इस्लाम के विरोध में वो एक साथ क्यों हैं ?

सामान्य भारतीय मुसलमान इस्लाम के बताये ढंग से नहीं जीता। मुहम्मद जी के किये को सुन्नत ज़रूर मानता है मगर उसे अपने जीवन में नहीं उतारता. इस्लाम ऐसे अनेकों काम पिक्चर देखना, दाढ़ी काटना, संगीत सुनना, शायरी करना इत्यादि के विरोध में है मगर आप इन विषयों में उसकी एक नहीं मानते तो इन राष्ट्र विरोधी कामों के विरोध में क्यों नहीं खड़े होते ? जितने हंगामों की चर्चा मैंने पहले की है उनमें सारा भारतीय मुसलमान सम्मिलित नहीं था मगर वो इन बेहूदगियों का विरोध करने की जगह चुप रहा है।

देश में फैले लाखों मदरसों और लाखों मुल्लाओं के प्रचार के बावजूद ईराक़ जाने वाले 20 लोग नहीं मिले जबकि संसार के अन्य देशों से ढेरों लोग सीरिया और ईराक़ गए हैं. अभी तक मुल्ला वर्ग अपने पूरे प्रयासों के बाद भी अपनी दृष्टि में आपको पूरी तरह से असली मुसलमान यानी तालिबानी नहीं बना पाया है. आपने उनकी बातों की लम्बे समय से अवहेलना की है मगर अब पानी गले तक आ गया है। आपको उनके कहे-किये-सोचे के कारण उन बातों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, आप जिनके पक्ष में नहीं हैं। आपको आपकी इच्छा के विपरीत ये समूह अराष्ट्रीय बनाने पर तुला है. आपको अब्दुल हमीद की जगह मुहम्मद अली जिनाह बनाना चाहता है। मैं समझता हूं कि आपको संभवतः मुल्ला पार्टी का दबाव महसूस होता होगा। देश बंधुओ इनका विरोध कीजिये. आपके साथ पूरा राष्ट्र खड़ा है और होगा। भारत में प्रजातान्त्रिक क़ानून चलते हैं. यहाँ फ़तवों की स्थिति कूड़ेदान में पड़े काग़ज़ बल्कि टॉयलेट पेपर जितनी ही है और होनी चाहिए। भारत एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों का राष्ट्र है. यहाँ का इस्लाम भी अरबी इस्लाम से उसी तरह भिन्न है जैसे ईरान का इस्लाम अरबी इस्लाम से अलग है। यही भारतीय राष्ट्र की शक्ति है। आप महान भारतीय पूर्वजों की वैसे ही संतान हैं जैसे मैं हूं। ये राष्ट्र उतना ही आपका है जितना मेरा है। आप भी वैसे ही ऋषियों के वंशज हैं जैसे मैं हूं। आपको राष्ट्र-विरोधी बनाने पर तुले इन मुल्लाओं को दफ़ा कीजिये, इन से दूर रहिये और इन पर लानत भेजिए. आइये अपनी जड़ों को पुष्ट करें

Sabhar from तुफ़ैल चतुर्वेदी

ध्वस्त विरोधी शिविर, खंडित छत्र, पाञ्चजन्य का गौरव-घोष...


ध्वस्त विरोधी शिविर, खंडित छत्र, धरती पर लोटते हुए महारथी, भग्न रथ, दम दबा कर भाग चुकी शत्रु सेना, लहराती विजय पताकाएँ, दमादम गूंजते हुए नगाड़े, बजती हुई विजय दुंदुभी, पाञ्चजन्य का गौरव-घोष, कराहते हुए दिग्पराजय, कैड़ा सिंह, मणि कंकर, निशीत, कालू जैसे लोग. इन घटनाओं के निकट प्रत्यक्षदर्शी मीडिया को ये सब देखते और उच्छ्वासें छोड़ते अभी कुछ ही समय बीता है. इन सबको बोलने-कोसने और हाहाकार मचाने के लिए कोई विषय नहीं मिल रहा था. अचानक आगरा ने हू-हू  की सियार-ध्वनि के लिए अवसर दे दिया।

आगरा में 350 लोग मुसलमान से हिन्दू बन गए और सब पर आसमान टूट पड़ा. आइये धर्मांतरण पर विचार करें। सर विद्याधर सूरज प्रसाद नायपॉल विश्व के महानतम लेखकों में से एक हैं. उन्हें लेखन के बुकर इत्यादि अन्य सारे बड़े पुरस्कारों के साथ नोबेल पुरस्कार भी मिला है. वो 1954 से लिख रहे हैं. एक पाकिस्तानी मुस्लिम महिला नादिरा जी से विवाहित हैं. वो भारत के नहीं हैं और उन्हें किसी भी तरह सांप्रदायिक हिन्दू नहीं कहा जा सकता. उनकी भारत पर तीन पुस्तकों में से एक "India : A Wounded Civilization-भारत एक आहत सभ्यता", एक चर्चित किताब है. वो उस किताब में लिखते हैं. " कहा जाता है कि सत्रह बरस के एक बालक के नेतृत्व में अरबों ने भारतीय राज्य को रौंदा था. सिंध आज भारत का हिस्सा नहीं है, उस अरब आक्रमण के बाद से भारत सिमट गया है. { अन्य } कोई भी सभ्यता ऐसी नहीं जिसने बाहरी दुनिया से निपटने के लिए इतनी कम तैयारी रखी हो; कोई अन्य देश इतनी आसानी से हमले और लूट-पाट का शिकार नहीं हुआ, { शायद ही } ऐसा कोई देश और होगा जिसने अपनी बर्बादियों से इतना कम सीखा होगा"। वो इसी किताब में इंडोनेशिया के बारे में कहते हैं " मुझे ऐसे लोग मिले जो इस्लाम और प्रोद्योगिकी के समागम के द्वारा अपना इतिहास खो चुके थे". पाकिस्तान के बारे में सर नायपॉल बताते हैं " पाकिस्तान से अधिक किसी भी देश में इतिहास को एक सांस्कृतिक रेगिस्तान में नहीं बदला गया. ये सारे शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं. "भारत का सिमट जाना, इस्लाम द्वारा इतिहास खो जाना, सांस्कृतिक रेगिस्तान" ये शब्दावलि कैंसर के फोड़े का फट जाना बल्कि विस्फोट हो जाना है.

कोई भी देश अपने राष्ट्र द्वारा ही रक्षित होता है. चीन की रक्षा चीनी लोग ही करते हैं. जापान की रक्षा जापानी लोग ही करते हैं. रूस की रक्षा रुसी लोग ही करते हैं. इसी तरह भारत की रक्षा भारतीयों का कर्तव्य है. तो इस आगरा पर हू-हू  की सियार-ध्वनि को क्या समझा जाये ? भारत से अधिक इस्लाम के जघन्य हत्याकांडों का और कौन शिकार बना है ? भारत से अधिक किस देश के लाखों लोग गुलाम बना कर बाजारों में बेचे गए ? सदियों तक महिलाओं की लूट और उन पर नृशंस बलात्कारों की आंधी भारत से अधिक किस देश में चली ? भारत के अतिरिक्त किस देश के पूजा-स्थल सदियों तक तोड़े गए ? और भारत से अतिरिक्त और कौन सा देश है जहाँ के निवासी इन सब अत्याचारों को सदियों देखने के बाद भी " ईश्वर अल्ला तेरो नाम" हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई- आपस में भाई-भाई" का गाना मय-हारमोनियम-तबले के पूरी तन्मयता से गाते हों ?

सर नायपॉल ने बिलकुल सही कहा है " { भारत के अतिरिक्त अन्य } कोई भी सभ्यता ऐसी नहीं जिसने बाहरी दुनिया से निपटने के लिए इतनी कम तैयारी रखी हो; कोई अन्य देश इतनी आसानी से हमले और लूट-पाट का शिकार नहीं हुआ, { शायद ही } ऐसा कोई देश और होगा जिसने अपनी बर्बादियों से इतना कम सीखा होगा"। नागालैंड, मिजोरम में समस्या क्यों है और साथ के प्रदेश त्रिपुरा में वही समस्या क्यों नहीं है ? हैदराबाद, मुरादाबाद, अलीगढ, रामपुर, बरेली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मेरठ में आये दिन सांप्रदायिक तनाव क्यों होता है ? क्यों वो तनाव नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, टिहरी, पौड़ी जिलों में नहीं होता ? क्या हिंदू इतने भोले हैं कि उस क्षेत्र के मुस्लिम बहुल होने  के कारण होने वाले खतरों को नहीं समझते ? क्यों दंगा अथवा साम्प्रदायिक तनाव उन स्थलों पर नहीं होता जहाँ मुसलमान बहुत कम संख्या में हैं ?

अभी ईराक  से लौटे अरीब के सम्बन्ध में जो जानकारियां अख़बारों से मिल रही हैं उनमें ये भी है कि, बंगलौर में किसी आई टी कंपनी में काम करने वाला मेहंदी मसरूर बिस्वास ट्विटर के माध्यम से सारी दुनिया में आई.एस.आई.एस. के लिए अभियान चलाता है और हर महीने बीस लाख लोग उसका ट्विटर पढ़ते हैं. उसके जहरीले ट्विटर संदेशों के समर्थन में भी हजारों सन्देश आते हैं. वंदेमातरम के रचयिता बंकिम चंद्र, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, काजी नजरुल इस्लाम के बंगाल का ही मेहंदी मसरूर बिस्वास और उसके समर्थन में हजारों सन्देश भेजने वाले ये लोग कौन हैं ? कैसे ऋषियों की परंपरा के लोग, आर्यों की संतानें अपने ही समाज, अपने ही देश, अपने ही राष्ट्र की विरोधी हो गयीं ?

मित्रो ये कोई नई बात नहीं है. भारत पर आक्रमण करने वाले सबसे दुष्ट हमलावरों में से प्रमुख नाम अहमद शाह अब्दाली का है. मित्रो ! वो भारत पर आक्रमण करने स्वयं ही नहीं आया था. उसे दिल्ली के शाह वलीउल्लाह {1703–1762} ने ये कह कर बुलाया था कि आओ और काफिरों की शक्ति को ख़त्म करो, हिन्दुस्तान के मुसलमान तुम्हारा साथ देंगे। विचारणीय है कि वलीउल्लाह ने भारत के मुसलमानों की तरफ से देश का विरोध करने के लिए कैसे अहमद शाह अब्दाली को आश्वस्त किया ? उसे कैसे हर मुसलमान की या बहुसंख्य मुसलमानों की मानसिक स्थिति का ज्ञान था ? क्या इस्लाम में कुछ ऐसा है जो मुसलमानों को अराष्ट्रीय बनाता है ? बल्कान, तुर्की, अफगानिस्तान, चीन के प्रान्त सिंक्यांग, ईराक, सीरिया, कश्मीर की लड़ाई में विश्व के अनेकों देशों के मुसलमानों की भागीदारी से स्पष्ट हो ही जाता है कि इस्लाम में वाकई कुछ ऐसा है जो मुसलमानों को अराष्ट्रीय बनाता है.

यहाँ कुछ सामायिक प्रश्न मेरे मन में उठ रहे हैं. मैं उन्हें आप तक पहुँचाना चाहता हूँ. लौकिक संस्कृत का शब्दशः परफैक्ट व्याकरण लिखने वाले पाणिनि का गांधार तालिबान का अफगानिस्तान किस कारण बना ? पाकिस्तान का रावलपिंडी { ये नाम स्वयं कहानी कह रहा है } जनपद, जहाँ का तक्षशिला विश्वविद्यालय संसार का पहला विश्वविद्यालय था. जहाँ आचार्य कौटिल्य, आचार्य जीवक जैसे लोग बेबीलोन, ग्रीस, सीरिया,चीन इत्यादि देशों से आये 10. 500 छात्रों को वेद, भाषा, व्याकरण, दर्शन शास्त्र, औषध विज्ञान, शल्य चिकित्सा, धनुर्विद्या, राजनीति, युद्ध शास्त्र, खगोल विद्या, अंक गणित, संगीत, नृत्य इत्यादि विषयों की शिक्षा देते थे, रूप बदल कर जमातुद्दावा, हरकतुल अंसार का पाकिस्तान कैसे बन गया ? बंगाल { बांग्ला देश } के नाम से विहित और सबको अपनी शीतल छांव देने वाली ढाकेश्वरी माँ का धाम ढाका उसके उपासकों के शत्रुओं का घर कैसे बन गया ? ईराक और सीरिया में फैले गरुण की उपासना करने वाले, यज्ञ करने वाले मूर्ति-पूजक यजदी नमाज़ भी पढ़ने वाले यजीदी बनने पर क्यों विवश हो गए ? क्यों आई.एस.आई.एस. के लोग उनका समूल-संहार कर रहे हैं ? बल्कि सदियों से क्यों उनका संहार किया जाता रहा है ?

सऊदी अरब, ईरान, ईराक, कज्जाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, आइजरबैजान जैसे अनेकों देशों में भग्न मंदिर, यज्ञशालाएं किसकी हैं और उन्हें किसने बनाया था ? वो भग्न कैसे हो गयीं ? उन्हें बनाने वाले, वहां उपासना करने वाले लोग कहाँ गए ? कश्मीर जो तंत्र के आचार्यों का क्षेत्र था, जहाँ तंत्र-कुल के लोग आज भी अपने नाम के आगे कौल लगाते हैं तंत्र-विहीन, कुल-विहीन कैसे हो गया ? क्यों इन सारे क्षेत्र के लोगों में अपनी परंपरा, अपने कुल के प्रति द्वेष पैदा हो गया ? अपने पूर्वजों, परम्पराओं, इतिहास के प्रति घृणा अर्थात आत्मघाती प्रवृत्ति कोई सामान्य बात नहीं है तो एक दो लोगों में नहीं बल्कि पूरे समाज में जन्मी कैसे ? कैसे इन क्षेत्रों के लोगों में एक ऐसे उत्स जिसकी भाषा भी वो नहीं जानते के के प्रति लगाव कैसे जाग गया ? इन भिन्न-भिन्न देशों, भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के लोगों ने एक ऐसी विदेशी आस्था, जिसने उनके पूर्वजों को भयानक पीड़ा दी, को स्वीकार क्यों किया ? इन देशों, समाजों के लोग अपने पूर्वजों की जगह अरब मूल से स्वयं को क्यों जोड़ने लगे ?

इन सारे प्रश्नों का केवल एक ही उत्तर है कि वहां के हिंदू धर्मान्तरित हो कर मुसलमान हो गए. इन ऐतिहासिक घटनाओं की तार्किक निष्पत्ति है कि "हिन्दुओं का धर्मान्तरण राष्ट्रांतरण है". हिन्दुओं से किसी अन्य मत में स्थानांतरण राष्ट्रांतरण होता है और अन्य मतों से प्रति-धर्मान्तरण राष्ट्र और देश को मजबूत करता है. हिन्दुओं का सबल होना भारत का सबल होना है. हिंदुओं की स्थिति का दुर्बल होना भारत को दुर्बल करता है. तो साहब देशभक्त इसे कैसे स्वीकार करें ? देश के शरीर पर निकलते जा रहे फोड़ों का इलाज क्यों नहीं करें ?  इनका इलाज आगरा में किया जा रहा प्रति-धर्मान्तरण नहीं है तो क्या है ? ऐसे किसी भी कार्य का विरोध तो होगा ही होगा। 350 की संख्या उल्लेखनीय है मगर हमें तो करोड़ों की संख्या का मानस बदलना है. अनेकों देशों में भूले-बिसरे, छूट गए बंधुओं की सुधि लेनी है अतः ये हू-हू  की सियार-ध्वनि तो तब तक होती ही रहेगी जब तक इस समस्या की सर्वतोभावेन चिकित्सा नहीं हो जाती। आखिर जिस प्रक्रिया के कारण अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश भारत से अलग हुए थे, उसी प्रक्रिया के उलटने से वापस आएंगे। और इस बार पूरे समाज को बाहें फैला कर बिछड़े बंधुओं को गले लगाना है और भारत को तोड़ने वालों से निबटना, को निबटाना है.

with thanks तुफैल चतुर्वेदी